चाणक्य नीति अध्याय प्रथम – Chanakya Neeti In Hindi

चाणक्य नीति हिन्दी मे :-  अध्याय प्रथम

1. इस शास्त्र का विधिपूर्वक अध्ययन करके यह जाना जा सकता हैं कि कौन – सा कार्य करना चाहिए और कौन – सा कार्य नहीं करना चाहिए। यह जानकर वह एक प्रकार से धर्मोंपदेश प्राप्त करता है कि किसी कार्य के करने से अच्छा परिणाम निकलेगा और किससे बुरा। उसे अच्छे – बुरे का ज्ञान हो जाता हैं।

2. लोगों के हित कामना से मैं यहाँ उस शास्त्र को कहूँगा, जिसके जान लेने से मनुष्य सब कुछ जान लेने वाला – सा हो जाता हैं।

3. मूर्ख छात्रों को पढ़ाने तथा दुष्ट स्त्री के पालन पोषण से और दुःखियों के साथ संबंध रखने से, बुद्धिमान व्यक्ति भी दुःखी होता हैं। तात्पर्य यह कि मूर्ख शिष्य को कभी भी उचित उपदेश नहीं देना चाहिए, पतित आचरण वाली स्त्री की संगति करना तथा दुःखी। मनुष्यों के साथ समागम करने से विद्वान तथा भले व्यक्ति को दुःख ही उठाना पड़ता हैं।

4. दुष्ट स्त्री, छल करने वाला मित्र, पलट कर तीखा जवाब देने वाला नौकर तथा जिस घर में सांप रहता हो, उस घर में निवास करने वाले गृहस्वामी की मौत में संशय न करें। वह निश्चित मृत्यु को प्राप्त होता हैं।

5. विपत्ति के समय काम आने वाले धन की रक्षा करें। धन से स्त्री की रक्षा करें और अपनी रक्षा धन और स्त्री से सदा करें।

6. आपत्ति से बचने के लिए धन की रक्षा करें, क्योंकि पता नहीं कब आपदा आ जाए। लक्ष्मी तो चंचल हैं। संचय किया गया धन कभी भी नष्ट हो सकता है।

7. जिस देश में सम्मान नहीं, आजीविका के साधन नहीं, बन्धु – बांधव अर्थात परिवार नहीं और विद्या प्राप्त करने के साधन नहीं हो, वहाँ कभी नहीं रहना चाहिए।

8. जहाँ धनी, ज्ञानी, राजा, नदी और वैद्य ये पांच न हो।वहाँ एक दिन भी नहीं रहना चाहिए। भावार्थ यह कि जिस जगह पर इन पांचों का अभाव हो, वहाँ मनुष्य को एक दिन भी नहीं ठहरना चाहिए।

9. जहां जीविका भय लज्जा चतुराई और त्याग की भावना, ये पाँँचो न हो, वहाँ के लोगों के साथ कभी न रहेंं, और न उनसे व्यवहार करें।

10. नौकरों को बाहर भेजने पर, संकट के समय भाई बंधुओं को तथा विपत्ति में दोस्त को और धन के नष्ट हो जाने पर अपनी स्त्री को परखना चाहिए अर्थात उनकी परीक्षा लेनी चाहिए।

11. बीमारी मे, विपत्तिकाल मे, अकाल के समय दुश्मनों से दुःख पाने या आक्रमण होने पर, राजदरबार मे और शमशान – भूमि में जो साथ रहता है। वहीं सच्चा भाई अथवा बन्धु हैं।

12. जो अपने निश्चित कर्मों अथवा वस्तु का त्याग करके, अनिश्चित की चिंता करता है, उसका अनिश्चित लक्ष्य तो नष्ट होता ही है, निश्चित भी नष्ट हो जाता हैं।

13. बुद्धिहीन व्यक्ति को अच्छे कुल में जन्म लेने वाली कुरूप कन्या से भी विवाह कर लेना चाहिए, परन्तु अच्छे रूप वाली नीच कुल की कन्या से विवाह नहीं करना चाहिए, क्योंकि विवाह संबंध समान कुल मे ही श्रेष्ठ होता है।

14. लम्बे नाखून वाले हिंसक पशुओं, नदियों, बड़े बड़े सींग वाले पशुओं, शस्त्रधारियों, स्त्रियों और राज परिवारो का कभी विश्वास नहीं करना चाहिए।

15.बिष से अमृत, अशुद्ध स्थान से सोना, नीच कुल वाले से विद्या और दुष्ट स्वभाव वाले कुल की गुणी स्त्री को ग्रहण करना अनुचित नहीं हैं।

16. पुरूषों की अपेक्षा स्त्रियों का भोजन दुगुना, लज्जा चौगुनी, साहस छः गुणी और काम आठ गुणी होती हैं।

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