चाणक्य नीति अध्याय सोलहवां : Chanakya Neeti In Hindi

चाणक्य नीति हिन्दी में :- अध्याय सोलहवां

1. श्री कृष्ण को उलाहना देती हुई गोपी कहती है कि हे कन्हैया ! तुमने एक बार गोवर्धन नामक पर्वत को क्या उठा लिया कि तुम इस लोक में ही नहीं, परलोक में भी गोवर्धन धारी के रूप में प्रसिद्ध हो गए, परन्तु आश्चर्य तो इस बात का है कि मैं तीनों लोकों के स्वामी अर्थात तुम्हें अपने हृदय पर धारण किए रहती हूं और रात दिन मैं तुम्हारी चिंता करती हूं, पर मुझे कोई त्रिलोक धारी जैसी पदवी नहीं देता। भाव यह है कि यश सम्मान तो पुण्य और भाग्य से ही प्राप्त होता है।

2. संसार से उद्धार के लिए जिन लोगों ने विधिपूर्वक परमेश्वर का ध्यान नहीं किया, स्वर्ग में समर्थ धर्म का उपार्जन नहीं किया, स्वप्न में भी किसी सुंदर युवती के कठोर स्तनो और जंघाओं के आलिंगन का भोग नहीं किया, ऐसे व्यक्ति का जन्म माता के यौवन रूपी वन को काटने वाली कुल्हाड़ी के समान है।

3. आचार्य चाणक्य का मानना है कि कुलट स्त्रियों का प्रेम एकांतिक न होकर बहुजनीय होता है। उनका कहना है कि कुलट स्त्रियां पराए व्यक्ति से बातचीत करती हैं, कटाक्षपूर्वक देखती हैं और अपने हृदय में पर पुरुष का चिंतन करती हैं, इस प्रकार चरित्रहीन स्त्रियों का प्रेम अनेक से होता है।

4. जो मूर्ख व्यक्ति माया के मोह में वशीभूत होकर यह सोचता है कि अमुक स्त्री उस पर आसक्त है, वह उस स्त्री के वश में होकर खेल की चिड़िया की भांति इधर से उधर नाचता फिरता है।

5. आचार्य चाणक का कहना है कि इस संसार में कोई भाग्यशाली व्यक्ति की मोह माया से छूटकर मोक्ष प्राप्त करता है। उनका कहना है धन  वैभव को प्राप्त करके ऐसा कौन है, जो इस संसार में अहंकारी ना हुआ हो, ऐसा कौन सा व्यभिचारी है, जिसके पापों को परमात्मा ने नष्ट कर दिया हो, इस पृथ्वी पर ऐसा कौन धीर पुरुष है, जिसका मन स्त्रीयों के प्रति व्याकुल न हुआ हो, ऐसा कौन पुरुष है, जिसे मृत्यु ने न दबोचा हो, ऐसा कौन सा भिखारी है, जिसे बड़प्पन मिला हो, ऐसा कौन सा दुष्ट है, जो अपने संपूर्ण दुर्गुणों के साथ इस संसार से कल्याण पथ पर अग्रसर हुआ हो।

6. स्वर्ग मृग न तो ब्रह्मा ने रचा था और न किसी और ने उसे बनाया था, न पहले कभी देखा गया था, न कभी सुना गया था तब भी श्री राम की उसे पाने की इच्छा हुई अर्थात सीता के कहने पर वे उसे पाने के लिए दौड़ पड़े। किसी ने ठीक ही कहा है विनाश काले विपरीत बुद्धि। जब विनाश काल आता है, तब बुद्धि नष्ट हो जाती है।

7. गुणों की सभी जगह पूजा होती है, न कि बड़ी संपत्तियों की। क्या पूर्णिमा के चांद को उसी प्रकार से नमन नहीं करते, जैसे द्वितीय के चांद को ?

8. दूसरों के द्वारा गुणों का बखान करने पर, बिना गुण वाला व्यक्ति भी गुणी कहलाता है, किंतु अपने मुंह से अपनी बड़ाई करने पर इंद्र भी छोटा हो जाता है।

9. जो व्यक्ति विवेकशील है और विचार करके ही कोई कार्य संपन्न करता है, ऐसे व्यक्ति के गुण श्रेष्ठ विचारों को मेल से और भी सुंदर हो जाते हैं। जैसे सोने में जड़ा हुआ रत्न स्वयं ही अत्यंत शोभा को प्राप्त हो जाता है।

10. जो व्यक्ति, किसी गुणी व्यक्ति का आश्रित नहीं है, वह व्यक्ति ईश्वरीय गुणों से युक्त होने पर भी कष्ट झेलता है, जैसे अनमोल श्रेष्ठ मणि को भी सोने की जरूरत होती है अर्थात सोने में जड़े जाने के उपरांत ही उसकी शोभा में चार चांद लगते हैं.

11. जो धन अति कष्ट से प्राप्त हो, धर्म का त्याग करने से प्राप्त हो, शत्रुओं के सामने झुकने अथवा समर्पण करने से प्राप्त हो, ऐसा धन हमें नहीं चाहिए।

12. उस लक्ष्मी से क्या लाभ जो घर की कुलवधू के समान केवल स्वामी के उपभोग में ही आए। उसे तो उस वेश्या के समान होना चाहिए जिसका उपयोग सब कर सकें।

13. इस संसार में आज तक किसी को भी प्राप्त धन से, इस जीवन से, स्त्री से और खान पान से पूर्व तृप्ति कभी नहीं मिली। पहले भी, अब भी और आगे भी इन चीजों से संतोष होने वाला नहीं है। इनका जितना उपभोग किया जाता हैं, उतनी ही तृष्णा बढ़ती जाती है।

14. तिनका हल्का होता है, तिनके से भी हल्की रूई होती है, रूई से भी हल्का याचक होता है, तब वायु उसे उड़ा कर क्यों नहीं ले जाती ? संभावतः इस भय से कि कहीं यह उससे भी भीख ना मांगने लगे।

15. अपमान कराके जीने से तो अच्छा मर जाना है, क्योंकि प्राणों के त्यागने से एक ही बार कष्ट होगा, पर अपमानित होकर जीवित रहने से जीवन पर्यंत दुख होगा।

16. मधुर वचन सभी को संतुष्ट करते हैं, इसलिए सदैव मृदुभाषी होना चाहिए। मधुर वचन बोलने में कैसी दरिद्रता ?  जो व्यक्ति मीठा बोलता है, उससे सभी प्रसन्न रहते हैं।

17. इस संसार रूपी बिष वृक्ष पर दो अमृत के समान मीठे फल लगते हैं। एक मधुर और दूसरा सत्संगति। मधुर बोलने और अच्छे लोगों की संगति करने से विष वृक्ष का प्रभाव नष्ट हो जाता है और उसका कल्याण हो जाता है।

18. जो विद्या पुस्तकों में लिखी है और कंठस्थ नहीं है तथा जो धन दूसरों के हाथों में गया है, ये दोनों काम के समय काम नहीं आते। भाव यह है कि विद्या को सदैव कंठस्थ रखना चाहिए और धन को सदैव अपने हाथ में रखना चाहिए ताकि जरूरत के वक्त काम आ सके।

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